आस्था के नाम पर समझौते: धर्म नहीं, अवसर का खेल?
Guidanceकुछ लोग अपने-अपने दीन-धर्म में रहकर, अपनी धार्मिक आस्था से जुड़ी प्रार्थनाओं और धर्म-कर्म के कामों में शामिल दिखाई देते हैं।
उनका पहनावा और चाल-चलन देखकर लोग अक्सर यही मान लेते हैं कि यह व्यक्ति तो बहुत धार्मिक किस्म का इंसान है।
लेकिन ज़रा रुकिए।
सोचिए।
क्या कहीं ऐसा तो नहीं कि यह धार्मिकता सिर्फ़ तभी तक रहती हो, जब तक वह व्यक्ति किसी परेशानी में है?
या फिर यह धार्मिकता इसलिए दिखती हो क्योंकि उसे कभी बुराई करने का मौका ही नहीं मिला?
या फिर यह सब उसकी आर्थिक स्थिति का ही असर हो?
आज मैं इस विषय पर इसलिए लिख रहा हूँ, क्योंकि हाल ही में स्क्रॉल करते समय मुझे एक सेलेब्रिटी का एक वीडियो दिखा, जिसमें उसके नृत्य-भाव से जुड़ी हरकतें उसकी पुरानी आस्था से पूरी तरह उलट थीं।
ध्यान देने वाली बात यह है कि जब उसके परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी, तब बहुत कम उम्र में ही वह भक्ति-भजनों से जुड़े कार्यक्रमों में दिखाई देने लगी। उस समय यह सब सिर्फ़ आस्था नहीं था, बल्कि ज़रूरत भी थी। उन्हीं मंचों से उसकी पहचान बनी, वहीं से उसे सम्मान मिला, और उसी रास्ते से उसके परिवार का गुज़ारा चलता रहा। उसे देखकर लोग यह मान बैठे कि वह पूरी तरह धर्म और श्रद्धा में रची-बसी लड़की है।
समय बदला।
हालात बदले।
मंच बदले।
और उसी के साथ बदल गया वह रूप, जिसे कभी लोग आस्था का प्रतीक मानते थे। अब उसके हाव-भाव, उसकी प्रस्तुतियाँ और उसका सार्वजनिक व्यक्तित्व उस पुरानी छवि से बिल्कुल उलट दिखाई देने लगे।
सवाल यह नहीं है कि वह आज क्या कर रही है—वह उसका निजी जीवन और उसका चुनाव है।
सवाल यह है कि जिस चीज़ को हमने कभी “श्रद्धा” समझ लिया था, वह वास्तव में कितनी गहरी थी, और कितनी हालात के साथ ढलने वाली।
यहीं पर भ्रम पैदा होता है।
हम अक्सर किसी इंसान के काम, पहनावे या मंच को देखकर उसके भीतर झाँके बिना ही फ़ैसला कर लेते हैं। हम मान लेते हैं कि जो धर्म से जुड़ा दिख रहा है, वह भीतर से भी वैसा ही होगा। जबकि सच्चाई यह है कि कई बार धर्म आस्था से नहीं, ज़रूरत से शुरू होता है — और ज़रूरत खत्म होते ही उसका रूप भी बदल जाता है।
ऐसे मामलों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि कोई व्यक्ति आज क्या कर रहा है, बल्कि यह होता है कि हमने उसे कल क्या मान लिया था। हमने उसकी ज़रूरतों को उसकी आस्था समझ लिया, उसके हालात को उसका चरित्र मान लिया, और उसके मंच को उसकी आत्मा से जोड़ दिया। यहीं पर हमारी समझ चूक जाती है।
समस्या उस लड़की में नहीं है, जिसने समय के साथ अपने रास्ते बदले।
समस्या उस नज़र में है, जो हर धार्मिक दिखने वाले चेहरे को बिना परखे “सच्चा” मान लेती है।
हम यह मान लेते हैं कि जो भक्ति में दिख रहा है, वह भीतर से भी वैसा ही होगा।
जबकि सच्चाई यह है कि कई बार भक्ति और धर्म रोज़गार का ज़रिया भी होते हैं — सम्मान का साधन भी, और पहचान का माध्यम भी।
इसीलिए जब हालात बदलते हैं, तो रूप बदलता है।
जब ज़रूरत बदलती है, तो रास्ता बदलता है।
और जब विकल्प मिलते हैं, तो असली स्वभाव सामने आता है।
कुछ लोगों के लिए धार्मिकता
तभी तक रहती है
जब तक उनके सामने
कोई बड़ा लालच नहीं आता।
और कुछ ऐसे भी होते हैं
जिनकी धार्मिकता बस इतनी-सी होती है कि
अगर उन्हें लगे कि आसपास के लोग
धर्म के हिसाब से नहीं चल रहे,
तो वे भी उसी पल
धर्म का रास्ता छोड़ देते हैं।
मतलब साफ़ है—
सवाल धर्म का नहीं,
सवाल चरित्र और नीयत का है।
क्योंकि मौका मिलने पर
इंसान वही बनता है
जो वह भीतर से होता है।
अब मैं आपको एक दिलचस्प किस्सा सुनाता हूँ।
मेरे पड़ोस में एक परिवार रहता है।
एक समय था जब वे दुनियावी चीज़ों के बहुत शौकीन थे।
न कोई बॉलीवुड फ़िल्म उनसे छूटती थी,
न हॉलीवुड।
उनकी ज़िंदगी में
संगीत था,
फ़िल्में थीं,
धारावाहिक थे,
शेर-ओ-शायरियाँ थीं—
यानी जीवन रंगों से भरा हुआ था।
फिर वक्त बदला।
फ़िल्मों और धारावाहिकों में वह मज़ा नहीं रहा जो पहले था।
शायद इसी खालीपन से उन्होंने धर्म का रास्ता पकड़ लिया।
धीरे-धीरे वे इतने सख्त हो गए कि अपनी पुरानी पसंद की हर चीज़ छोड़ दी।
अब अगर कोई संगीत या फ़िल्म की बात करता, तो उसे टोक दिया जाता।
उनकी हर बातचीत प्रवचन बन गई।
यानी कुछ लोगों की धार्मिकता
आस्था से नहीं,
मनोरंजन के अभाव से शुरू होती है।
लेकिन वक्त ने फिर करवट ली।
एक फ़िल्म आई,
जिसका संगीत इतना शानदार था
कि उसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल हो गया।
बस फिर क्या था—
दबा हुआ शौक
एक बार फिर
जाग उठा।
जो लोग कल तक धारावाहिकों के नाम से भी परहेज़ करने लगे थे,
वे फिर उसी रंगीन ज़िंदगी में लौट आए।
कुछ लोग ऐसे भी होते हैं कि
जब वे धार्मिक चोला ओढ़ लेते हैं
और खुद को प्रार्थनाओं का पाबंद मानने लगते हैं,
तो वे दूसरों को भी उसी रास्ते पर चलने के लिए
टोकना और नसीहत देना शुरू कर देते हैं—
सिर्फ़ इसलिए कि लोग उन्हें धर्मी मानें।
पुरानी जीवनशैली
पीछे छूट जाती है,
छुपे हुए गुनाह पहले की तरह ही
रोज़मर्रा की आदत बने रहते हैं—
और वे दूसरों को ऐसा दिखाते हैं
कि अब उनका उनसे
कोई लेना-देना नहीं।
इनकी प्रार्थनाएँ
इसलिए नहीं होतीं कि वे बेहतर इंसान बनें,
बल्कि इसलिए होती हैं कि
ईश्वर उनसे खुश हो जाए।
प्रार्थना खत्म होते ही
इनका दिल जैसे कह उठता है—
“अब जो करना है, करो!”
असल में,
यही लोग बार-बार वही काम कर बैठते हैं
जिसे वे खुद ग़लत मानते हैं।
इसी वजह से उनका ज़मीर
बार-बार प्रार्थनाओं में शामिल होने को बेचैन रहता है।
और जो लोग
खुद को ग़लत कामों से बचाकर रखते हैं,
उन्हें ये लोग अपने से छोटा समझते हैं—
सिर्फ़ इसलिए कि वे
प्रार्थनाओं में शामिल नहीं रहते।
ऐसे ही लोग धीरे-धीरे किसी न किसी धार्मिक समूह का हिस्सा बन जाते हैं।
गलियों में, मोहल्लों में, सभाओं में — उनका उद्देश्य प्रार्थना से ज़्यादा प्रचार होता है।
वे उन लोगों को भी खींच लाना चाहते हैं, जो उनकी तरह नहीं चलते।
सवाल आस्था का नहीं होता,
सवाल संख्या का होता है।
जितने ज़्यादा लोग साथ दिखें,
उतनी ही मज़बूत धार्मिक पहचान बनती है।
सीधे-साधे लोगों से कहा जाता है—
देखो, हम वही कर रहे हैं जो पहले के महान लोग करते आए हैं।
पर कोई यह नहीं पूछता कि वे लोग कैसे थे, और हम कैसे हैं।
परंपरा का नाम लिया जाता है,
पर चरित्र की बात टाल दी जाती है।
इसी तर्क के सहारे
और लोगों को जोड़ा जाता है।
लोग जुड़ते हैं—
इसमें कोई बुराई नहीं।
लेकिन असली खेल तब सामने आता है
जब वही बॉलीवुड,
जिसे कल तक ‘माया’, ‘भटकाव’ और ‘फितना’ कहा जा रहा था,
फिर से अच्छा कंटेंट
या कहिए मधुर संगीत देने लगता है।
तब क्या होता है?
वही लोग,
जो कल तक समूहों में घूम-घूमकर
दूसरों को नसीहतें देते थे,
आज फिर उसी संगीत में
अपना दिल लुटा बैठते हैं।
ध्यान रखिए—
मैं यहाँ संगीत सुनने वालों के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कह रहा।
संगीत तो आत्मा की भाषा है।
मैं जिस बात की ओर इशारा कर रहा हूँ, वह यह है कि
जिन लोगों को हम धार्मिक समझ लेते हैं,
उनकी धार्मिकता कई बार बहुत सस्ती भी हो सकती है,
इसका अंदाज़ा हमें देर से होता है।
इनकी एक और पहचान यह भी होती है कि
ये अक्सर
ईश्वर द्वारा गुनाह माफ़ किए जाने की बातें
बहुत ज़ोर-शोर से करते हैं।
इससे साफ़ पता चलता है कि उनकी सोच
कुछ ऐसी बन जाती है—
पहले ग़लत करो,
फिर प्रार्थना में जाकर माफ़ी माँगो।
फिर ग़लत करो,
फिर माफ़ी माँगो।
और यह सिलसिला
चलता ही रहे।
और हर बार
मन खुद को समझा लेता है
कि अब सब ठीक हो गया।
लेकिन असली सवाल यह नहीं है
कि माफ़ी माँगी या नहीं।
असली सवाल यह है
कि गलती के बाद इंसान बदला या नहीं।
यहीं फर्क है
आत्म-संतोष
और आत्म-जवाबदेही में।
आत्म-संतोष कहता है—
मैंने प्रार्थना कर ली, अब मैं सही हूँ।
आत्म-जवाबदेही कहती है—
मैंने जो किया,
क्या वह दोबारा नहीं होना चाहिए?
जहाँ आत्म-जवाबदेही होती है,
वहाँ प्रार्थना ढाल नहीं बनती।
और जहाँ प्रार्थना ढाल बन जाती है,
वहाँ इंसान खुद से बचने लगता है।
हम रोज़ देखते हैं—
कोई सिर झुकाता है,
कोई हाथ उठाता है,
कोई तय समय पर
तय शब्द दोहराता है।
और हमें लगता है—
“यह तो ज़रूर बहुत धार्मिक होगा।”
यहीं से कहानी उलझती है।
क्योंकि धर्म
सिर्फ़ झुकने का नाम नहीं है,
सिर्फ़ बोलने का नाम नहीं है,
और सिर्फ़ दिखने का नाम भी नहीं है।
धर्म तो वहाँ शुरू होता है
जहाँ इंसान
दूसरे इंसान के काम आता है।
अजीब बात है—
जो लोग धर्म की सबसे ज़्यादा बातें करते हैं,
अक्सर वही
सबसे कम सहनशील होते हैं।
और जो लोग
धर्म की बातें नहीं करते,
न कोई चिह्न दिखाते हैं,
न कोई दावा करते हैं—
वही अक्सर
सबसे ज़्यादा धर्म निभा रहे होते हैं।
कुछ लोग धर्म को
अपने भीतर रखते हैं।
उनका धर्म
उनके व्यवहार में दिखता है।
कुछ लोग धर्म को
कपड़ों में,
आवाज़ में,
और पहचान में रखते हैं।
कुछ लोग धर्म को
समय पर निभाते हैं,
और उसके बाद
सब कुछ भूल जाते हैं।
कुछ लोग धर्म को
दूसरों पर थोपते हैं
और खुद को
ऊपर समझने लगते हैं।
और कुछ लोग
न धर्म समझते हैं,
न इंसान।
यही सच्चाई है।
अगर धर्म सच में भीतर होता है,
तो वह इंसान को
नरम बनाता है,
संवेदनशील बनाता है,
और ज़िम्मेदार बनाता है।
और अगर धर्म
सिर्फ़ बाहर होता है,
तो वह अक्सर
अहंकार बन जाता है।
सबसे बड़ा धोखा यही है
कि जो सबसे ज़्यादा धार्मिक दिखता है,
वही सबसे ज़्यादा सही होगा।
नहीं।
धर्म कोई प्रतियोगिता नहीं,
धर्म कोई प्रदर्शन नहीं,
धर्म कोई पहचान-पत्र नहीं।
धर्म तो
चुपचाप किया जाने वाला काम है।
वह वहाँ होता है
जहाँ कोई देख नहीं रहा होता,
जहाँ कोई तारीफ़ नहीं कर रहा होता।
और शायद
इसी वजह से
सबसे सच्चा धर्म
अक्सर दिखाई ही नहीं देता।
क्योंकि वह
शोर नहीं करता,
वह बस
इंसान बनाता है।
यही धर्म है।
बाकी सब—व्याख्या है।







